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राजनीति: बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफा देने के दौरान बहे उनके आंसू की एक बूंद उत्तराखंड में भी गिरी…

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राजनीति: बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफा देने के दौरान बहे उनके आंसू की एक बूंद उत्तराखंड में भी गिरी…

कर्नाटक से उत्तराखंड की दूरी लगभग 2200 किलोमीटर है। लेकिन आज कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में जब भाजपा के 78 साल के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे रहे थे तो उनकी आंखों में ‘आंसू’ छलक आए। येदियुरप्पा के आंसुओं की एक बूंद उत्तराखंड में भी दिखाई दी। अब आप सोचेंगे येदियुरप्पा और उत्तराखंड का क्या संबंध है। आइए हम ही बता देते हैं दोनों राज्यों में भाजपा नेताओं के मुख्यमंत्रियों का क्या संबंध है। उत्तराखंड और कर्नाटक में कोई भी भाजपा का नेता अपना मुख्यमंत्री का ‘सफर’ (5 साल) पूरा नहीं कर सके। येदियुरप्पा पांच दशक से सक्रिय राजनीति में हैं। लेकिन बीएस येदियुरप्पा का ‘दुर्भाग्य’ रहा जिन्होंने कर्नाटक में चार बार मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली लेकिन एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।

आपको बता दें कि बीएस येदियुरप्पा सबसे पहले 12 नवंबर 2007 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने, लेकिन महज सात दिन बाद 19 नवंबर 2007 को ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 30 मई 2008 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस बार 4 अगस्त 2011 को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद येदियुरप्पा नेे भाजपा से नाता तोड़ लिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले येदियुरप्पा फिर भाजपा में शामिल हो गए। पार्टी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंप दी और 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से दूर थी। येदियुरप्पा ने तीसरी बार 17 मई 2018 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन सदन में बहुमत साबित नहीं कर सके। इसके चलते 23 मई 2018 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई और कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों की आपसी खींचतान की वजह से कुमारस्वामी ज्यादा दिन तक अपनी सरकार चला नहीं पाए। उसके बाद चौथी बार 26 जुलाई 2019 को येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने और ठीक दो साल बाद आज ‘भरे मन’ से इस्तीफा दे दिया। ‘दक्षिण के राज्यों में कमल खिलाने वाले बीएस येदियुरप्पा ही ऐसे नेता रहे हैं जिनकी वजह से कर्नाटक में भाजपा की पहली बार सरकार बनी थी’।

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वहीं येदियुरप्पा के अलावा बीजेपी की ओर से जगदीश शेट्टार और डीवी सदानंदा गौड़ा भी मुख्यमंत्री रहे, लेकिन यह दोनों नेता भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। बता दें कि कर्नाटक के सियासी इतिहास में सिर्फ तीन सीएम रहे हैं, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है। एन निजलिंगप्पा (1962-68), डी देवराजा उर्स (1972-77) और सिद्धरमैया ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। तीनों कांग्रेस के नेता हैं। गौरतलब है कि कर्नाटक 1956 में बना था। तब से राज्य ने 25 मुख्यमंत्री देखे जिनमें ज्यादातर कांग्रेस से थे। लेकिन सिर्फ तीन मुख्यमंत्री ही यहां अपना कार्यकाल पूरा कर सके हैं। इसके अलावा कोई भी सीएम अपना पांच साल का ‘सफर’ पूरा नहीं कर सका है।

 

उत्तराखंड में भी भाजपा हाईकमान अपने मुख्यमंत्रियों को बदलती रही है—

9 नवंबर साल 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था। अभी तक इस राज्य में कोई भी भाजपा का नेता अपना मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। आलाकमान ने राज्य में 7 बार अपने मुख्यमंत्रियों को बदला है। साल 2000 में जब उत्तराखंड को अलग राज्य घोषित किया गया था, तब बीजेपी के नित्यानंद स्वामी को सीएम पद दिया गया था। उन्होंने कुछ समय के लिए उस ‘अंतरिम सरकार’ को संभाला भी, लेकिन फिर एक साल पूरा होने से पहले ही उनकी जगह भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। 2002 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने ये बड़ा फैसला लिया था। लेकिन इस साल कांग्रेस की सरकार बन गई। इस प्रकार भगत सिंह कोश्यारी भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। साल 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने फिर वापसी की। मुख्यमंत्री के रूप में मेजर जनरल बीसी खंडूरी को चुन लिया गया।

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अब उन्हें सत्ता को संभाले दो ही साल हो पाए थे कि पार्टी के कई विधायकों की ‘नाराजगी’ की वजह से बीसी खंडूरी को अपनी ‘कुर्सी’ गंवानी पड़ी। बीजेपी ने एक बार फिर अपना मुख्यमंत्री बदला और ब्राह्मण चेहरे के रूप में रमेश पोखरियाल निशंक को सीएम बना दिया। क्योंकि 2012 के विधानसभा चुनाव करीब थे, ऐसे में बीजेपी को निशंक के नेतृत्व पर भी ज्यादा भरोसा नहीं रहा और राज्य में एक बार फिर बीसी खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन साल 2012 के उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर एक बार वापसी की।

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उसके बाद 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की कमान संभाली और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी साल 10 मार्च को त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी हटाकर तीरथ सिंह रावत को कमान सौंपी गई। करीब 4 महीने बाद इसी महीने 4 जुलाई को तीरथ सिंह रावत को भी हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। ‘त्रिवेंद्र सिंह रावत उत्तराखंड में भाजपा के एक ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने सबसे अधिक 4 साल का कार्यकाल पूरा किया’। उत्तराखंड में कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ही मुख्यमंत्री का पांच साल कार्यकाल पूरा कर सके ।

बता दें कि येदियुरप्पा कर्नाटक में ‘लिंगायत समुदाय’ के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। राज्य की राजनीति में लिंगायत समाज का अच्छा खासा प्रभाव है। इसी को देखते हुए हाईकमान कर्नाटक में भाजपा के कुछ मंत्री और विधायकों की नाराजगी के बाद भी येदियुरप्पा को काफी समय से हटाने के लिए ‘पशोपेश’ में था। कुछ दिनों पहले दिल्ली आकर येदियुरप्पा ने पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की थी तभी उनको हटाने की मुहर लग गई थी। बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद ‘नाराजगी’ भी सामने आने लगी है। ‘कर्नाटक में लिंगायत मठों के प्रमुखों ने येदियुरप्पा को हटाने के फैसले को गलत बताया है। राज्य के प्रसिद्ध लिंगेश्वर मंदिर के मठाधीश शरन बासवलिंगा ने कहा कि ‘पार्टी आलाकमान ने बिना सोच विचार के यह फैसला लिया है, भाजपा को इसका नतीजा भुगतना पड़ेगा’।

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