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धार्मिक रीति-रिवाजों और हरियाली-रिमझिम के बीच मन को सुखद एहसास भी कराता है सावन…

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धार्मिक रीति-रिवाजों और हरियाली-रिमझिम के बीच मन को सुखद एहसास भी कराता है सावन…

आज संडे होने की वजह से और दिनों की अपेक्षा सुकून है। मन गुनगुनाने को कर रहा है। तो देर किस बात की है आइए कुछ सुन लिया जाए, फिर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। ‘आया सावन झूम के, तुझे गीतों में ढालूंगा सावन को आने दो, तेरी दो टकियो की नौकरी में, मेरा लाखों का सावन जाए, सावन का महीना पवन करे शोर, दिल में आग लगाए सावन का महीना, सावन जो आग लगाए, उसे कौन बुझाए’। अब तक आप समझ ही गए होंगे यह फिल्मी गानों की लाइनें क्यों लिखी जा रही हैं, नहीं समझे चलिए हम ही बता देते हैं । आज से सावन का महीना शुरू हो गया है। आषाढ़ के बाद आने वाला यह माह धार्मिक के साथ कई प्राचीन परंपराओं की भी याद दिलाता है। यहां हम आपको बता दें कि हिंदू धर्म में सावन के महीने का बहुत अधिक महत्व है। सावन का महीना भगवान शिव का प्रिय महीना भी माना जाता है । इस बार सावन 25 जुलाई से 22 अगस्त तक रहेगा।

सावन चातुर्मास मास का प्रथम महीना होता है।चातुर्मास में भगवान शिव पृथ्वी का भ्रमण करते हैं और अपने भक्तों को शुभ फल प्रदान कर आशीर्वाद देते हैं । इसलिए चातुर्मास में सावन के महीने का विशेष महत्व है। सोमवार का व्रत दांपत्य जीवन के लिए शुभ फलदायी माना गया है। सावन में सोमवार के व्रत और भगवान शिव का अभिषेक करने से सभी प्रकारों के कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है । इस महीने में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। ज्योतिष के अनुसार इस बार सावन के महीने में पड़ने वाले हर सोमवार को विशेष योग बन रहा है। माना जा रहा है कि इसमें पूजा-व्रत करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। 26 जुलाई को सावन का पहला सोमवार है। इस दिन सौभाग्य योग बन रहा है।

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2 अगस्त को सावन का दूसरा सोमवार है। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। 9 अगस्त को सावन का तीसरा सोमवार पड़ रहा है। इस दिन वरीयान योग बन रहा है। 16 अगस्त को सावन का चौथा सोमवार है। इस दिन ब्रह्मयोग, यायिजय योग और सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है।

सावन सोमवार को भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है–

माना जाता है कि सावन में सोमवार के व्रत करने से व्यक्ति के मन की हर मनोकामना पूरी होती है। भक्त सावन सोमवार के व्रत रखते हैं । इस दिन को सावन की सोमवारी के नाम से जाना जाता है ‌। कहा जाता है इस व्रत को करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं । सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से भी सावन सोमवार व्रत रखने की मान्यता है । इस महीने में भक्त पवित्र नदियों से जल लाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं । सावन लेकर ऐसी धार्मिक मान्यता भी चली आ रही है कि जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था । अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया । पार्वती ने युवावस्था के सावन में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद ही शंकर महादेव के लिए यह विशेष हो गया ।

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हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को जलाभिषेक करते हैं भक्त—

सावन में पूरे एक महीने श्रद्धालुओं के बम-बम बोल उद्घोष सुनाई पड़ते हैं ।‌ बता दें कि सावन के महीने में पूरे देश भर में श्रद्धालु कावड़ यात्रा करते हैं । उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा में कांवड़ यात्रियों की सबसे अधिक भीड़ देखी जाती है । साथ ही कांवड़ मेले का आयोजन भी नहीं होगा । कांवड़ यात्रा केेे बारे में ऐसी मान्यता चली आ रही है कि भगवान परशुराम ने शिव मंदिर बनाने का संकल्प लिया था । इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वह हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे । हरिद्वार के गंगा तट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया । तब से ही कहा जाता है कि परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से कावड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है । सावन में लाखों की संख्या में श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों पर जलाभिषेक करते हैं । इस बार भी कोविड-19 महामारी चलते इस बार श्रद्धालु कांवड़ नहीं ला सकेंगे । जिसकी वजह से लाखों श्रद्धालु मायूस है। अब बात करेंगे पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों की।

सावन में हरियाली के बीच बारिश की फुहारों में झूला झूलने की रही है परंपरा–

बता दें कि सावन में चारों ओर हरियाली अपनी छटा बिखेरती हैं। मोर भी नृत्य करने लगते हैं । बारिश की रिमझिम-फुहारों हर किसी का मन मोह लेती है। सावन की घटाएं छा जाती हैं। मन प्रफुल्लित (आनंदमय) होने लगता है। वैसे यह भी सच है कि बदलते परिवेश में सावन जैसा एहसास अब कम ही होने लगा है। पहले जैसा सावन मन में न आग लगाता है और न दिल मचलता है । गांवों में भी सावन की बहारें भी कम दिखती हैं । सावन के झूलों ने मुझको बुलाया, मैं परदेसी घर आया । इसी प्रकार के सावन में झूलों को लेकर सैकड़ों गीत लिखे गए हैं । सावन में अगर झूलों की बात न हो तो यह माह पूरा नहीं होता है । हमारे देश में सावन मास में झूलों का पेड़ों की टहनियों में पड़ जाना पुरानी परंपरा रही है ।‌

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महिलाएं और बच्चे, बड़े सभी झूले के आनंद में सराबोर हो जाते हैं । झूले को झोंका देते हुए महिलाएं मल्हार गाती थीं और हल्की बारिश की फुहारों में झूले पर लंबी-लंबी पैंग बढ़ाकर झूले को तेज करते हुए पेड़ों की शाखाओं को छू लेना सुखद हो जाता है । लेकिन यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है । वो झूले, मल्हार, सखा सहेलियों का बचपन सब कुछ ओझल सा हुआ जा रहा है। भागदौड़ भरी जिंदगी में अब लोगों को पता ही नहीं चलता कि सावन कब आकर गुजर जाता है। अब वही बचपन सोशल मीडिया (डिजिटल युग) में उलझकर रह गया है। इंसान की जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई है कि उसे परंपराओं की परवाह नहीं रहती। सावन के झूले भी धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर अग्रसर हैं । आओ सावन मास में झूला झूलने की परंपरा को एक बार फिर वापस लें आए ।

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