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फैसला: भांग के औषधीय गुणों को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता, प्रतिबंधित मादक पदार्थ की सूची से हटाया।

देहरादून: भांग एक ऐसा पौधा जो आमतौर पर नशे के लिए बदनाम है, लेकिन इस पौधे में कई औषधीय गुण भी हैं। आयुर्वेद में भी इसका जिक्र मिलता है। भांग के पौधों से निकले रेशों से हस्तशिल्प तैयार होता है, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भांग उत्तराखंड़ के पहाड़ क्षेत्रों में रोजगार का अच्छा जरिया बन रहा है।

कभी नशे के लिए बदनाम भांग का पौधा अब पहाड़ में रोजगार का अच्छा माध्यम बन रहा है। भांग की टहनियों से निकले रेशों से शानदार उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। जिससे हस्तशिल्प को बढ़ावा मिल रहा है। प्रदेश में कई जगह भांग की खेती के लिए लाइसेंस भी जारी कर दिए गए।

उत्तराखंड में भांग की खेती करने वालों के लिए एक अच्छी खबर आ रही है कि भांग से बनी दवाओं को संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता दे दी है। संयुक्त राष्ट्र के नारकोटिक्स औषधि आयोग ने भांग को दवा के तौर पर स्वीकारा है और इसे खतरनाक पदार्थों वाली सूची से हटाकर कम खतरनाक पदार्थ की लिस्ट में शामिल कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र के नारकोटिक्स औषधि आयोग की सूची-4 में भांग को सख्त पाबंदियों वाले मादक पदार्थों की सूची में शामिल था। इस लिस्ट में अफीम और हेरोइन जैसे पदार्थ शामिल हैं। लेकिन अब भांग कम खतरनाक मानी जाने वाली लिस्ट में रहेगा। संयुक्‍त राष्‍ट्र में इसे लेकर एक ऐतिहासिक मतदान हुआ। जिसके बाद इसे एक दवा के रूप में मान्‍यता दे दी गई। भांग को प्रतिबंधित मादक पदार्थों की लिस्‍ट से निकाले जाने के लिए यूएन ने मतदान कराया था।

इस मतदान के पक्ष में 27 देशों ने और 25 सदस्‍यों ने इसके खिलाफ मतदान किया। भारत ने समर्थन में वोट डाला। अमेरिका और ज्यादातर यूरोपीय देश भी भांग को पाबंदियों की सख्त सूची से हटाने के पक्षधर रहे। भांग को भले ही सूची-4 से हटा लिया गया है, लेकिन यूएन के कानून के अनुसार इसे अब भी गैर मेडिकल इस्तेमाल के तौर पर एक प्रतिबंधित ड्रग ही माना जाएगा।

साल 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भांग और इसके रस को 1961 में बनी प्रतिबंधित मादक पदार्थों की चौथी सूची से हटाने की सिफारिश की थी, क्योंकि भांग का इस्तेमाल कई दर्द निवारक दवाओं में हो रहा है। वोटिंग के बाद भांग को लिस्ट-4 से हटा लिया गया। फिलहाल 50 से अधिक देशों ने भांग की मेडिकल वैल्यू को समझते हुए इसे किसी ना किसी स्तर पर वैध किया है।

संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले के बाद भांग से बनी दवाओं के इस्तेमाल में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा भांग को लेकर साइंटिफिक रिसर्च को भी बढ़ावा मिलेगा। भांग में कई औषधीय गुण हैं, आयुर्वेद में भी इसका जिक्र मिलता है।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में भांग प्रचुर मात्रा में होती है, खाली पड़ी जमीन पर भांग के पौधे स्वभाविक रूप से पैदा हो जाते हैं। पिथौरागढ़, नैनीताल, अल्मोडा़, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी सहित सभी पहाड़ी जनपदों में बरसात के बाद भांग के पौधे सर्वत्र देखे जा सकते हैं। उत्तराखंड के कुछ जनपदों में कानूनी तौर पर भांग की खेती शुरू की गई है। आज अमेरिका, फ्रांस, यूरोप, चीन, कनाडा के बाद अब उत्तराखंड में भांग की खेती हो रही है।

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