उत्तराखंड
उत्तराखंड: सशक्त महिलाओं की देवभूमि के नाम शर्मनाक उपलब्धि, लिंगानुपात में देश का सबसे फिसड्डी राज्य बना..
देहरादून: उत्तराखंड को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता, यहां आदिकाल से ही नारी शक्ति की पूजा की परंपरा रही है। यहां देवियों के कई पौराणिक मंदिर हैं तो वहीं नंदा देवी राजजात जैसी विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहां तक की उत्तराखंड राज्य गठन में भी नारी शक्ति का अहम योगदान रहा है, महिला शक्ति ही थी जिसने राज्य आंदोलन को गति देने का काम करते हुए बेहद अहम भूमिका निभाई थी। यहां पेड़ों को बचाने के लिए गौरा देवी का योगदान पूरे विश्व में एक मिसाल के रूप में पेश किया जाता है। आज भी प्रदेश में तकरीबन 50 फीसद महिला वोटर हैं, सरकार गठन में महिलाओं की भूमिका भी अहम है। वर्तमान में प्रदेश के शीर्ष पद यानी राज्यपाल पद भी महिला ही आसीन हैं बेबी रानी मौर्य और पहले भी मार्गेट आल्वा राज्यपाल का पद संभाल चुकी हैं।
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वर्तमान समय में भी प्रदेश सरकार में रेखा आर्य महिला एवं बाल विकास मंत्री, राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में जिम्मा संभाल रही हैं। कई महिलाएं प्रशासनिक पदों, जिलाधिकारी के पदों के साथ ही पुलिस विभाग में भी कई अहम पदों पर हैं। आज की महिलाएं न सिर्फ अधिक सशक्त हैं, बल्कि उनकी रचनात्मक क्षमता भी अपार है। महिलाएं खुद को साबित कर रही हैं। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि महिलाएं कई क्षेत्रों में पुरुषों से बेहतर काम कर रही हैं। महिलाओं को लेकर समाज का नजरिया भी अब स्पष्ट होने लगा है। प्रदेश में महिला के सशक्त होने के साथ ही प्रदेश के नाम मौजूद वक़्त में एक शर्मनाक रिकॉर्ड दर्ज हुआ है। देवभूमि उत्तराखंड में बाल लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इसी वजह से उत्तराखंड देश का सबसे खराब लिंगानुपात वाला राज्य बन गया है।
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कुछ दिनों पहले नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्यों के आंकड़ों को जारी किया था, जिससे पता चला था कि उत्तराखंड का बाल लिंगानुपात देश में सबसे खराब है और राज्य में हर साल लगातार गिरावट आ रही है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक साल 2005 से 2006 में किए गए तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चला कि जन्म के समय उत्तराखंड का लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुष के जन्म पर 912 महिलाओं का था, जो उस समय के राष्ट्रीय औसत से कम था। वहीं एक दशक के बाद 2015-16 में उत्तराखंड में जन्म के समय लिंगानुपात एनएचएफएस 4 के मुताबिक गिरकर 888 हो गया। उस दौरान एसडीजी सर्वेक्षणों के मुताबिक 2018 में अनुपात गिरकर 850 और उसके बाद अगले साल 841 हो गया था। वहीं इस बार साल 2021 में ये अनुपात 840 है, जिसकी वजह से उत्तराखंड सबसे खराब लिंगानुपात वाला राज्य बन गया है।
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वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने उत्तराखंड की घटती संख्या को चिंता का विषय बताया है। उत्तराखंड समय पर नहीं चेता और उसने उचित कदम नहीं उठाए। जिसके कारण शिशु जन्म में लिंग अनुपात के मामले में सबसे पिछड़े राज्य के तौर पर उत्तराखंड ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। हैरत और दुख की बात यह है कि 2021 में ऐसे आंकड़े होंगे, यह अनुमान विशेषज्ञों ने पांच साल पहले ही लगा लिया था। एसडीजी ने जो आंकड़े जारी किए, उनके मुताबिक शिशु जन्म के समय बाल लिंगानुपात के सबसे बेहतर आंकड़े छत्तीसगढ़ में दिखाई दिए, जहां यह अनुपात 1000:958 रहा। साफ तौर पर यह राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है। 957 के अनुपात के साथ केरल इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहा और पंजाब में 890 और हरियाणा में 843 का औसत चिंताजनक ज़रूर है, लेकिन पहले कम सेक्स रेशो के शिकार इन राज्यों के आंकड़े इस बार बेहतर दिखे। लेकिन उत्तराखंड में यह सूरत नहीं दिखाई दी।

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