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बलिदान: टिहरी के सुमन, जिन्हें युग युगों तक किया जाएगा स्मरण, पढिये वीर गाथा…

प्रस्तुतिः शम्भुशरण रतूड़ी

78 वीं पुण्यतिथि पर: श्री देव सुमन नाम के इस महान क्रान्तिकारी का जन्म 25 मई 1916 को पं. हरिराम बड़ोनी जी के घर ग्राम-जौल (चम्बा के नजदीक) जिला टिहरी, उत्तराखण्ड़ की पावन धारती पर हुआ था। पिता हरिराम बड़ोनी जी पंडिताई (ज्योतिष) के साथ-साथ वैद्य का काम भी करते थे।

उस समय नजदीक ग्राम में हैजा फैल गयी और वहाँ हैजा का इलाज करते-करते स्वयं हैजा के चपेट में आकर काल में समा गये। 1937 में स्वयं टिहरी नरेश ने सुमन जी को नरेन्द्रनगर बुलाया और उन्हें नौकरी करने पर जोर दिया। उस समय इन राजाओं को भय था कि यदि प्रजा में कोई पढ़लिख जायेगा तो अवश्य ही वह अत्याचारों के विरूद्ध कहेगा। वही हुआ। सुमन जी का उत्तर था कि महाराज ! मैं चन्द चांदी के टुकड़ों के लिये आपना भावी जीवन गिरवी नहीं रख सकता। भावी जीवन सुमन जी का क्या था -समाजसेवा व राष्ट्रप्रेम। सुमन जी गांव आते तो गरीब बच्चों को किताब, कापियां और पेंसिल आदि बांटते और रात्रि पाठशाला चलाते थे। सन् 1937 में विनयलक्ष्मी जी से विवाह के बाद वे देश की स्वतंत्रता व टिहरी नरेश नरेन्द्र शाह के अत्याचारों के विरूद्ध भाषण, लेख व जनता के बीच गांधी का सूत कातने वाला चर्खा चलाकर जनता को जागृत करने में जुट गये। 23 जनवरी सन् 1939 को देहरादून में टिहरी राजा से प्रजा के अधिकारो की मांग के लिये गाठित *टिहरी राज्य प्रजामण्डल* में मंत्री चुन लिये गये। लुधियाना (पंजाब) के खुले अधिवेषन में टिहरी के राजा द्वारा जनता पर हो रहे अत्याचारों को पं0 जवाहर लाल नेहरू (अध्यक्ष) के समक्ष रखा।

कि टिहरी राज्य के अन्दर प्रजा की स्थिति आज यह है कि वह अपनी आन्तरिक पीड़ा पर न रो सकती है, न कहीं बैठकर किसी को अपना दुःख -दर्द सुना सकती है। तरह-तरह के टैक्स औताली ,गयाली ,मुयाली ,देण-खेण, पौणटुटी, सौणी सेर, छूट, तुली पाथा, रकम, घाट, पाल, विषाउ, कुली उतरायण, छोटी बरदायष, बड़ी बरदायष, प्रभु सेवा आदि कई प्रकार के टैक्सों से जनता का शोषण चरम सीमा पर है। राज्य में जनता पशु से भी पतित जीवन व्यतीत कर रही है श्रीमन्!

देशी राज्य लोक परिशद् के सुमन जी स्थायी समिति में हिमालय प्रान्तीय देशी राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में चुने गये। सन् 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन की रूप रेखा की मिटिंग में सुमन जी महात्मा गांधी, नेहरू जी द्वारा बुलाई गई सभा में भाग लेने बम्बई (मुंबई) गये ।

दिसंबर 1942 में  सुमन जी को राज्य में प्रवेश करने से मना कर दिया गया व उनसे देशद्रोही जैसा व्यवहार किया जाने लगा। टिहरी राजा के गुप्तचर उनके घर (ग्राम-जौल) पर नजर रखने लगे। सुमन जी पर तरह-तरह के ऐक्ट लगाये जाने लगे। एक दिन 30 दिसम्बर, 1943 को श्री देव सुमन जी को टिहरी जेल की 8 नं कोठरी में डाला गया। उनके शरीर पर सिर से लेकर पैर तक 35 सेर वजन की बेड़ी पहना दी गई, न तो व ठीक से बैठ पाते न सो पाते। शरीर से सारे कपड़े उतार दिये गये। जाड़ों में उनके विस्तर पर पानी डाल दिया जाता, खाने के लिये उन्हें कांच और भूसे की रोटी दी जाती। सश्रम तथा तरह-तरह की कठोर यातनायें उन्हें दी जाती थी। उन पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा चलाकर, 2 वर्ष का कठोर कारावास एंव 200 रूपये जुर्माना सुनाया गया। सुमन जी ने जेल से राजा के लिये कई पत्र लिखे परन्तु उत्तर एक का भी नहीं आया। इन्हीं पत्रों में जनता की भलाई के लिये मांगी गई 20 सूत्रीय मांगो में से मांगे भी थीं।

मांगे नहीं सुनी गई। श्री देव सुमन जी ने 3 मई, सन् 1944 से टिहरी जेल के अन्दर अनषन प्रारम्भ कर दिया। जेल के कर्मचारियों, जेल दरोगा मोर सिंह द्वारा सुमन जी के अनषन तोड़ने के लिये जबरदस्ती नलियों के द्वारा उनके नाक व मुंह के रास्ते उन्हे दूध पिलाया जाता ।

टिहरी जेल के अन्दर सुमन जी पर अत्याचार बढ़ाये गये। सुमन जी को डा0 बेलीराम ने इन्ट्रावाईटिक का इन्जेक्षन दिया, वे पानी-पानी चिल्लाते रहे, परन्तु उन्हें पानी नहीं दिया गया। आखिर 25 जुलाई, सन् 1944 की सांय 3.30 बजे श्री देव सुमन जी को अत्याचारियों द्वारा मृत्यु की गहरी नींद सुला दिया गया और राष्ट्र के महान क्रान्तिकारी, जनता व राष्ट्र की भलाई के लिये 84 दिनों की ऐतिहासिक अनशन के पश्चात् राष्ट्र की बलिबेदी पर चढ़ गये। कहीं पता न चले, नहीं तो बाहर क्रान्ति की आग फैल जायेगी। रात में भिलंगना के गहरे पानी में मोर सिंह दरोगा व उनके सिपाहियों ने सुमन जी की लाश को फेंक दिया। उसके पश्चात उनकी लाश का कहीं पता भी नहीं चल पाया। भारत जैसे आध्यामिक धर्मपरायण राष्ट्र में उनके अंतिम संस्कारों के लिये उनके परिजनों को मृत शरीर भी नही सौंपा गया, जो अत्याचार की पराकाष्ठा व हिन्दू धर्म की धज्जियां उड़ाता हैं।

श्री देव सुमन जी की पत्नी श्रीमती विनयलक्ष्मी सुमन जी को हरिद्वार में अखबार के माध्यम से यह खबर एक हफ्ते बाद सुनने में आई। टिहरी के बगल में ही सुमन जी की ससुराल पडियारगांव में यह खबर 5 दिनों बाद सुनाई दी तो जनता में तब उबाल आया। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि- 15 जनवरी, 1948 (मकर संक्रान्ति) के दिन स्वयं टिहरी नरेश ने अपनी आंखो से देखा कि गुस्साई जनता ने अपने ही राजा को टिहरी भागीरथी पुल से उल्टा खदेड़ दिया व उन्हे टिहरी में प्रवेश नहीं करने दिया गया। और इस तरुण तपस्वी के बदौलत टिहरी की जनता राजशाही से मुक्त हुई । आज 78 वीं पुण्यतिथि पर युगपुरुष श्रीदेव सुमन  को शत् शत् नमन ! वंदन ! !
।। विनम्र श्रध्दांजली  ।।

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