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बड़ी खबरः सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उत्तराखंड सरकार से मांगी रिपोर्ट, दिया ये आदेश…

देहरादूनः सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तराखंड समेत देश के कई राज्यों में आयोजित धर्म संसद में नफरत भरे भाषण के खिलाफ दी गई याचिका पर सुनवाई की है। मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को हरिद्वार धर्म संसद में कथित रूप से अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले भाषणों की स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने कहा है कि सरकार 22 अप्रैल तक रिपोर्ट पेश करें। मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होगी। वहीं याचिकाकर्ता कुर्बान अली के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि रविवार को हिमाचल में भी धर्म संसद होने वाला है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमाचल के अधिकारियों को मामले के पुराने आदेश की जानकारी दें।

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मीडिया रिपोर्टस के अनुसार उत्तराखंड के हरिद्वार में हुई धर्म संसद में भड़काऊ भाषण का एक वीडियो सामने आने के बाद से बवाल मच गया था। दरअसल, इस धर्म संसद में एक वक्ता ने विवादित भाषण देते हुए कहा था कि धर्म की रक्षा के लिए हिंदुओं को हथियार उठाने की जरूरत है। वक्ता ने कहा था कि किसी भी हालत में देश में मुस्लिम प्रधानमंत्री न बने। वक्ता ने कहा था कि मुस्लिम आबादी बढ़ने पर रोक लगानी होगी। ये भड़काऊ भाषण का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया था न्यायमूर्ति एनएस धनिक की एकलपीठ ने इस मामले को सुनने से इनकार करते हुए दूसरी पीठ को भेज दिया था। हिन्दू साधु संतों द्वारा 17 से 19 दिसंबर तक धर्म संसद का आयोजन किया गया था। धर्म संसद में मुसलमानों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आह्वान किया गया था। यहीं नहीं मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ कुरान व पैगम्बर साहब के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग भी किया गया। भड़काऊ भाषण से जिले में अशांति का माहौल जितेंद्र नारायण त्यागी , यति नरसिंघानन्द और अन्य लोगों ने बाद में इसका वीडियो भी वायरल कर दिया था।

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गौरतलब है कि इस भड़काऊ भाषण से जिले में अशांति का माहौल बना रहा। भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हुई। प्रबोधानंद गिरी द्वारा हरिद्वार की मस्जिदों में रह रहे लोगों के खिलाफ हिंसा फैलाए जाने का प्रयास भी किया गया। 32 पूर्व अधिकारियों ने लिखा था खुला पत्र वहीं हरिद्वार में वर्ग विशेष के खिलाफ दिए गए भड़काऊ भाषणों के मामले में पूर्व सेनाध्यक्षों समेत कई मशहूर लोगों द्वारा कार्रवाई की मांग करने के एक दिन बाद भारतीय विदेश सेवा ( आईएफएस ) के 32 पूर्व अधिकारियों ने खुला पत्र लिखा था। आईएफएस के 32 पूर्व अधिकारियों ने कहा था कि किसी भी तरह की हिंसा के आह्वान की निंदा करते समय धर्म जाति , क्षेत्र या वैचारिक मूल का लिहाज नहीं किया जाना चाहिए।

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