उत्तराखंड
बूढाकेदार मोटर मार्ग आंदोलन की एक झलक भाग 3
*बूढ़ाकेदार मोटर मार्ग आन्दोलन की एक झलक*
*लेखकः शम्भुशरण रतूड़ी*
भाग 3
(मेरी अप्रकाशित पुस्तक *विद्रोही पथ का राही* के कुछ अंश)
*गातांक से आगे (3) ……………*
(अभी तक आपने पढ़ा कि टिहरी में प्रशासन और PWD की मिलीभगत से इस आन्दोलन को तोड़ने के लिये क्या क्या हथकंडे अपनाये गये ।
जैसे कि कार्यक्रम के मुताबिक मैं बूढ़ाकेदार गया और नेगीजी बासर की तरफ !
बासर की जुम्मेदारी उन्होंने श्रीगब्बरसिंह कठैत, श्री सोबतसिंह कठैत सेम-धनसाणी, धारगांव के श्री शूरबीरसिंह पंवार *सचिव* कन्डारस्यूं के श्री कबूलचंद कंडारी, गडारा के श्रीसोहनसिंह, भेटी -खवाड़ा व अन्य गावों की जुमेदारी वरिष्ठ समाजसेवी श्री राधाकृष्ण सेमवाल *सरपंच साहब* व नारायणसिंह बिष्ट *लालाजी* एवं श्री जब्बरसिंह पंवार (*पूर्व ब्लाक प्रमुख)के साथ हर गांवों के प्रधानों व समाजसेवियों से कहा गया कि सभी लोग ढोल-बाजणों के साथ टिहरी कूच करेंगे !
बूढ़ाकेदार से सर्वश्री पूरणसिंह राणा, बहादुरसिंह राणा, ज्ञानसिंह नेगी, नागेन्द्रनाथ, राजपाल राणा, विजयसिंह रावत (चौंंरड़ी) भोलासिंह नेगी (आगर) को मेड, मारवाडी, उर्णी, पिन्स्वाड, कोटी, आगुंडा, तितरुणा, विसन, कोट, तोली, भेजे गये कि दूर दूर के गांव वाले 17 तारीख शाम को ही बूढ़ाकेदार पहुंच जाय । जिनकी रहने खाने की पूरी व्यवस्था थाती गांव के लोगों ने अपने अपने घरों में की । जबकि श्री राधाकृष्ण सेमवालजी व श्री नारायणसिंह बिष्टजी की टीम जखाणा, गेंवाली, भिगुन, दल्ला, सौंला, कुण्डियाली, तिसरियाड़ा, चानी, डालगांव, पदोखा, खवाड़ा, भेटी की जनता को लामबंद कर रहे थे और पारिया बासर के लोगों को सर्वश्री गब्बरसिंह कठैत, सोबतसिंह कठैत, कबूलचंद कंडारी, शूरबीरसिंह पंवार, दयाराम रतूड़ी, सोहनसिंहजी आदि (कुछ लोगों के नाम याद नहीं आ रहे हैं, कृपया इसे अन्यथा न लें) कई वरिष्ठ समाजसेवी इस आन्दोलन की तैयारी में रात दिन जुटे हुये थे ।
आखिर वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया ! यानी 18 तारीख ।
समस्त आन्दोलनकारी *बूढ़ाकेदार मंदिर* में एकत्र होकर सर्व प्रथम बाबा बूढ़ाकेदार का आशीर्वाद लिया और *ढोल-दमांऊ-रणसिंंसिंघा-डौंरा-मसक्याबाजा* और *गुरुकैलापीर देवता* की जयकार के साथ *बलबीरसिंह नेगी* जिन्दाबाद ! ! ! PWD मुर्दाबाद के गगनभेदी नारों के साथ मंदिर प्रांगण से प्रस्थान किया ठीक 8 बजे सुबह ! आगे आगे वाद्य यंत्रों की गूंज तत्पश्चात् आन्दोलन का हीरो बलबीरसिंह नेगी और पीछे पीछे नर नारियों का हजूम ! बीच गाँव की सड़क से आन्दोलनकारियों का जत्था आगे बढ रहा था । अपने अपने घरों और खलियानों में महिलाएं सोलह श्रंगार किये हुये ! थाली में दीपक और कुमकुम-रोली सजाये हुये है और बलबीरसिंह नेगी के साथ आन्दोलनकारियों की आरती उतार रही थी तथा माथे पर विजयी तिलक कर रही थी ।
[ ] माहौल बेहद क्रान्तिमय तो था ही बल्कि कहीं कहीं पर महिलाएं खुशी से अपने आंसू भी नहीं रोक पा रही थी । लगातार गगनभेदी उदघोषों और वाद्य यंत्रों की चिंघाड़ से हर किसी के रोंगटे खड़े हो रहे थे । क्या बूढ़े ! क्या नौजवान ! ! क्या बच्चे ! ! ! सब इस अवस्मरणीय आन्दोलन का हिस्सा बनने के लिये आतुर थे । माहौल लगभग ठीक वैसा ही था – जब भारतीय फौज युद्ध के समय सीमा पर दुश्मनों से मुकाबला करने के लिये कूच करती है और पारम्परिक परिधान में भारतीय नर-नारी उन योद्धाओं को विदाई दे रही हो ! ठीक वैसे ही आन्दोलनकारी क्रान्तिकारी उदघोषों के साथ कतारबद्ध चल रहे थे ! इस आन्दोलनकारी फौज के कमांडर *बलबीरसिंह नेगी* के पीछे । सब लोग सिरवाड़ी में एकत्रित हो गये । मेड-मारवाड़ी, उर्णी-पिन्स्वाड के आन्दोलनकारीयों के पास *रियूँस* की लाठियों से लैस थे । वहां पर कुछ दिशा निर्देश हुये और खास आग्रह किया गया कि कोई भी आन्दोलनकारी अपना आपा न खोयें। धैर्य से रहे व अनुशासित रहें । क्योंकि हमें पूरा मालूम था कि इस आन्दोलन को कुचलने की प्रशासन कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा ! आन्दोलन के प्रमुख सूत्रधार श्री *बलबीरसिंह नेगी* व मुझे (इन पंक्तियों का लेखक) के साथ प्रमुख आन्दोलनकायों को गिरफ्तार किया सकता है । यहां पर यह उल्लेख करना अति आवश्यक है कि प्रशासन ने कुछ चाटुकार किस्म के नेताओं को अपनी और खींच लिया था जो आन्दोलन की पल पल की खबर प्रशासन को दे रहे थे और जनता के साथ भी *भले आदिमी* बने थे । इन शकुनियों ने आन्दोलनकारीयों में यह भ्रम फैलाने की भरपूर कोशिश की कि – गोलियां और लाठियां भी चल सकती है ! आपको और आपके अग्रणी नेताओं की गिरफ्तारी तो पक्की है ! ! फिर आप लोगों को भी बिना जमानत गिरफ्तार किया जा सकता है अतः तुम आन्दोलन में शिरकत मत करो आदि आदि …….। इसके बाद भी आन्दोलनकारी टस से मस नहीं हुये और ज्यादा जोश खरोश के साथ इन्कलाबी नारे लगाने लगे । ऊपरी क्षेत्र के आन्दोलनकारी *रियूँस* की लाठियां हवा में लहराते हुये कह रहे थे – जब तक हम जिन्दा रहेंगे तब तक दुनियां की कोई भी ताकत *बलबीरसिंह नेगी* का बाल बांका भी नही कर सकता । यदि गोलीकांड हुआ तो पहली हमारी छाती होगी उसके बाद बलबीरसिंह नेगी !
मुझे तो आज भी हैरानी है कि पीढी दर पीढीयों से दबे कुचले तथा सामाजिक विहीनता से जुड़े इन लोगों में उस दिन कैसे जनक्रान्ति का संचार हुआ ? कैसे सामाजिक चेतना जागी ?
*आप आगे पढेंगे कि चमियाला पहुंचाने पर आन्दोलनकारीयों पर क्या बीती तथा *लोक जीवन विकास भारती* प्रमुख भाई बिहारी लालजी को क्या संदेश (फतवा) मिला ?
(बस अपनी प्रतिक्रिया/ टिप्पणी भेजते रहे ताकि इस ऐतिहासिक आन्दोलन पर मेरा लिखना सार्थक हो । हो सकता है मैं कहीं पर गलत लिख रहा हूँ । इस सम्बन्ध में आपके पास कुछ जानकारी हो तो अवश्य प्रेषित करें ।
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