देहरादून
मिसालः ऋषिकेश में परंपरा तोड़ बेटी ने मां की अर्थी को दिया कंधा, चिता को दी मुखाग्नि…
ऋषिकेश: उत्तराखंड में भी बेटियां अब समाजिक सरोकार को तोड़ आगे बढ़ रही है। ऐसा ही मामला ऋषिकेश से सामने आया है। जिस मां का हाथ पकड़कर चलना सीखा। लाड प्यार से पाला, बड़ा किया। अपने पैरों पर खड़ा किया। उसी मां की अर्थी को बेटी ने कंधा देकर विदा किया तो लोगों की आंखें नम हो गईं। इतना ही नहीं एक बेटी ने पुरानी परंपरा को तोड़ने हुए अपने हाथों से मां के शव को मुखाग्नि दी है। बेटे के न होने पर बेटी अंतिम संस्कार का फर्ज निभाया। अब इसकी चर्चा पूरे शहर में हो रही है।
जब किसी के घर कोई बेटा नहीं होता तो समाज यहीं कहता है इनकी चिता को अग्नि कौन देगा कौन अर्थी को कंधा देगा। ये बाते परिवार को परेशान करती है। लेकिन अब बेटियां बेटों का फर्ज निभा रही है। ऐसा ही मामला ऋषिकेश के गंगानगर से सामने आया। यहां एसके अग्रवाल की पत्नी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। उनके परिवार में दो बेटियां हैं। एक बेटी यूएसए में है, जबकि दूसरी बेटी अंजलि बेंगलुरु में रहती है। मां के निधन की खबर मिलते ही अंजलि दुख से बेजार हो गईं। मां के अंतिम दर्शन करने के लिए वो बेंगलुरु से ऋषिकेश पहुंची। बात जब मां के अंतिम संस्कार की आई तो अंजलि ने मां के दाह संस्कार से जुड़ी रस्में निभाने का फैसला किया।
मां की मौत के बाद अंजली ने न सिर्फ खुद को संभाला बल्कि बेटे का फर्ज निभाते हुए उनका अंतिम संस्कार किया। उनकी अर्थी को कंधा दिया, मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की सारी प्रक्रिया संपन्न की। अंजलि ने कहा कि उनकी मां बेटे की तरह ही उनको बहुत प्यार करती थी। मां की तमन्ना थी कि उनकी मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को उनकी बेटी ही मुखाग्नि दे। अपनी मां की इच्छा को पूरा करते हुए उन्होंने सनातन धर्म के रीति-रिवाज अनुसार मुखाग्नि देकर अपना फर्ज निभाया है। बेटी के इस कदम पर लोगों ने कहा कि सामाजिक कुरुतियों को तोड़कर अंतिम संस्कार किया गया है, यह अच्छा है। लोगों ने परंपरा की दुहाई को दरकिनार करते हुए बेटी का हौसला बढ़ाया है। लोगों ने कहा कि यह एक बेटी द्वारा लिया गया कदम सराहनीय है।

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