उत्तराखंड
पहाड़ की धरती पर ऑर्गेनिक खेती सोने से कम नहीं, पसीना बहाकर युवा कर रहे खेती
देहरादून। कोरोना महामारी में इम्पोज लॉक डाउन के कारण उत्तराखण्ड से रोजगार के लिए पलायन करने वाले युवाओं की घर वापसी तो हो गई। लेकिन रोजगार को लेकर संकट भी मंडराने लगा। लेकिन जंहा चाह है वंहा राह है। इन प्रवासियों ने खेती कर आत्म निर्भर बनने की ठान ली है।
लॉक डाउन के बाद मैदानी क्षेत्रों में रोजगार की तलाश में गये युवा घर वापसी के बाद अब खेतो में पसीना बहाकर ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। जो सोने से कम नही है युवाओं का मनना है वह यूरिया उक्त खेती करने से परहेज रखेंगे। क्योंकि उससे खेती तो खराब हो ही रही है साथ ही उगने वाला अनाज भी धीमा जहर बन रहा है।
इसलिए ऑर्गनिक खेती पर जोर दिया जा रहा। यही नहीं बाज़ार में आर्गेनिक खेती से उगी फसल की डिमांड भी काफी बढ़ रही है। जब लोग आर्गेनिक खेती करेंगे तो पशुपालन भी बढ़ेगा और पशु सड़को पर नही बल्कि लोगो के घर मे रहे रहेंगे। जिसका लाभ लोगों को रोजगार में भी मिलेगा।
राज्य बनने के बाद से ही सरकार का प्रयास था कि पलायन पर रोक लगे और गांव आबाद हो अब त्रिवेंद्र सरकार को गांव में सुविधाओं की मुहिम चलाकर ये जताना होगा कि वे भी युवाओं के साथ है तभी पहाड़ो में खेत लहलहाते नजर आएंगे और दूर दराज के गांव में चहल पहल की निरंतरता बनी
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