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टिहरी गढ़वाल

उत्तराखंड में यहां एक माह बाद बनाई जाती है दीपावली, जानिए क्या है इसकी मान्यता…

टिहरीः पूरे देश में जहां दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी 3-4 नवंबर को मनाई जा चुकी है। वहीं देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा क्षेत्र भी है जहां दीपावली ठीक एक महा बाद मांगशीर माह की कृष्ण अमावस्या यानी 2-3 दिसंबर को मनाई जाएगी। उत्तराखंड राज्य के टिहरी गढ़वाल एवं उत्तरकाशी जिले के 180 गांव के लोग इस (बग्वाल) दीपावली की तैयारियों में इन दिनों खासे मशगूल है। इस पर्वतीय पर्व (बग्वाल) दीपावली पर देश के विभिन्न शहरों में रह रहे यहां के निवासियों के साथ ही सात समुंदर पार रोजगार कर रहे प्रवासी उत्तराखंडीयों का पहुंचना शुरू हो गया है। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक इस दीपावली की परंपरा लगभग 500 सौ वर्ष पुरानी है। 16 वीं शताब्दी में गढ़वाल नरेश महिपाल शाह के समय उत्तराखंड पर गोरखा राजाओं ने आक्रमण किया गया। इस लड़ाई में 180 गांव के इष्ट आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता ने इस युद्ध को जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजमनी देवता गुरु कैलापीर के आवाहन पर युद्ध में सक्रिय होते ही टिहरी गढ़वाल के बूढ़ाकेदार तथा उत्तरकाशी के 180 गांव के प्रत्येक परिवार के मुख्य लोगों के साथ ही वीर भड़ माधो सिंह भंडारी भी युद्ध में कूद पड़े। परिणाम स्वरूप गोरखा राजाओं को मुंह की खानी पड़ी और गढ़वाल नरेश महिपाल शाह की भारी जीत हुई। इस जीत पर खुश होकर गढ़वाल नरेश ने आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता को टिहरी के कुश कल्याण, बूढ़ाकेदार थाती कठूड सहित उत्तरकाशी के गाजणा कठूड, नेल्ड कठूड सहित क्षेत्र के 180 गांव देवता को भेंट स्वरूप जागीर में दिए।

युद्ध के समय चूंकि दीपावली थी और टिहरी गढ़वाल के साथ ही उत्तरकाशी के इन गांवों के लोग युद्ध में शामिल थे। इसलिए उस समय क्षेत्र में कार्तिक माह की दीपावली नहीं मनाई जा सकी। दीपावली के ठीक एक माह बाद मांगशीर माह में गुरु कैलापीर देवता के नेतृत्व में सभी लोग युद्ध जीतकर खुशी-खुशी अपने घर पहुंचे। युद्ध जीतने की खुशी में टिहरी गढ़वाल के बूढ़ाकेदार जौनपुर, थौलधार, प्रताप नगर, मदन नेगी, उत्तरकाशी के रवाई गाज़णा कठूड, नेल्ड कठूड श्रीनगर के मलेथा और कुमाऊं के कुछ गांव में भव्य दीपावली मनाई गई। यह परंपरा पिछले 500 वर्षों से आज भी बदस्तूर जारी है। इन गांव में एक अनोखी परंपरा यह भी है कि इन गांव के लोग कार्तिक माह की दीपावली को अपने रिश्तेदारों के घर जाकर दीपावली मनाते हैं। वही ठीक एक माह बाद मांगशिर माह की( बग्वाल) दीपावली पर अपने रिश्तेदारों को स्पेशल निमंत्रण देकर अपने यहां बुलाते हैं। क्षेत्रवासी मांगशिर माह में पड़ने वाली आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता की (बग्वाल) दीपावली का साल भर बेसब्री से इंतजार करते हैं। वहीं दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ व देश के विभिन्न शहरों में नौकरी व अपने व्यवसाय से छुट्टियां लेकर लोग घर आते हैं। टिहरी जिले के पौराणिक तीर्थ धाम बूढ़ाकेदार में 2-3 दिसंबर को मांगशिर माह की अमावस्या को दीपावली के दिन मुख्य आयोजन होता है।

थाती बूढ़ाकेदार गांव के मुख्य शेरा पुंडारा में रात्रि 11,12 बजे ढोल दमोऊ के नाद, रणसिंगे की हुंकार वा नगाड़े की धुन पर रसों का भव्य आयोजन किया जाता है। साथ ही सैकड़ों लोग भैलिया-बगोठो व सिटियों की गूंज के बीच विभिन्न प्रतिस्पर्धा भी आयोजित की जाती है। इस अवसर पर बलिराज, गोवर्धन पूजा, भैया दूज के तीन दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। वहीं इस बार 3 दिसंबर बड़ी (बग्वाल) दीपावली को साय 7:00 बजे आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता के मंदिर में पुजारी द्वारा पूजा अर्चना कर वाद्य यंत्रों के साथ बलराज मेले के लिए गुरु कैलापीर देवता को दीवार देऊ (निमंत्रण) दिया जाएगा और इस बार 4 दिसंबर को प्रातः मंदिर में पूजा अर्चना करने के पश्चात 1:00 बजे दिन में आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता के जय कारे के उदघोष के साथ ही सीटियों के गूंज एवं ढोल दमाऊ की नाद रणसिंगे की हुंकार व नगाड़े की धुन के बीच मंदिर से बाहर आने का न्योता दिया जाएगा। साथ ही उत्तरकाशी के नेल्ड कठूड, गाज़णा कठूड एवं टिहरी के थाती कठूड, बूढ़ाकेदार के मेड मारवाड़ी, निवाल गांव, आगर कोटि, आगुंडा, तितरुणा, पिनसवाड , के ठाकर् वाल (वीर भड़) अपने- अपने गांव से नाचते गाते हुए देवता के आशीर्वाद के लिए मंदिर प्रांगण में एकत्रित होंगे। सीडीओ की गूंज के साथ देवता को 1:00 बजे दिन में पुजारी के द्वारा मंदिर से शंखनाद की पवित्र ध्वनि के साथ बाहर लाकर निज वाला को सौंपा जाएगा। इसके पश्चात देवता पुंडारा शेरे में अपने भक्तों के सात फेरे लगाएंगे। इसी बीच ग्रामीण आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता के साथ ही दौड़ लगाकर फूल माला के साथ पुआल चढ़ाकर मन्नतें मांगगे।

ध्याणि एवं ध्याणता पिठाई- साडा भेंट कर सुख समृद्धि हेतु देवता से आशीर्वाद की कामना भी करते हैं। देवता द्वारा मनोकामनाएं एवं मन्नते पूर्ण करने के लिए निर्धारित समय दिया जाता है। जिन लोगों कि निर्धारित समय में मनोंकामना पूर्ण हो जाती है। वह भी आराध्य देव गुरु कैलापीर देवता के मेले में आकर देवता के मुख्य शेरे पुंडारा में सात फेरे दौड़ लगाकर इष्ट देवता को पिठाई पुआल (पराल) चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। वहीं देवता की तरफ से धियाणी द्वारा लगाई गई पिठाई को ही अपनी तरफ से धियाणी को भेंट स्वरूप दिया जाता है। साथ ही क्षेत्र से आए ठाकर् वालों  द्वारा देवता के मुख्य शेरे पुंडारा के मुख्य द्वार पर गली फोड, मल युद्ध, धक्का-मुक्की, आदि रोमांचक प्रतिस्पर्धा भी हर बार की तरह इस बार भी की जाएगी। इसके साथ ही गोरखीयाणी युद्ध की जीत को तरो ताजा किया जाता है। जिसे देखकर इष्ट देव गुरु कैलापीर देवता प्रसन्न होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। इस बार यह मेला 4, 5, 6, दिसंबर को भव्य रूप से मनाया जाएगा।

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