पौड़ी गढ़वाल
पहाड़ के सुनील ने कंडाली को दिलाई अलग पहचान, सैकड़ों लोगों को रोजगार देने के साथ ही कमा रहे लाखों…
कोटद्वार: कहते हैं न अगर आपके अंदर कुछ करने का जज्बा और मंजिल पाने का जुनून तो राह अपने आप ही बन जाती है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है कोटद्वार के चैलूसैण निवासी सुनील दत्त कोठारी ने। सुनील ने उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में पायी जाने वाली जिस घास को लोग छूने से डरते हैं। उसी घास को अपनी आय का जरिया बनाया है। जी हां, हम बात कर रहें हैं बिच्छू घास की। इससे स्थानी भाषा में कंडाली के नाम से जाना जाता है। कंडाली स्वाद से लेकर दवा और आय का स्रोत है। वैसे तो अगर ये घास गलती से छू जाए तो उस जगह झनझनाहट शुरू हो जाती है, लेकिन यह घास कई गुणों को समेटे हुए हैं, अब यही बिच्छू घास मुंबई-दिल्ली में उत्तराखंड को नई पहचान दे रही है। मुंबई-दिल्ली के बड़े होटलों में बिच्छू घास की चाय पसंद बनी है। यह सब संभव हो पाया सुनील की मेहनत की बदौलत।
जिंदगी में कभी भी ऐसा मोड़ आजाता है जो जिंदगी को बदल देता है। ऐसा ही हुआ सुनील के साथ वह करीब 22 वर्षों तक मुंबई में आइटीसी ग्रुप में सप्लाई चेन हेड पद पर कार्य करते रहे। लेकिन जब 2016 में वह घर वापस लौटे तो उन्होंने कुछ अलग करने की सोची तब उन्हें अपने दादा-परदादा के लिखित दस्तावेजों में बिच्छू बूटी (कंडाली) के गुणों का पता चला। बस क्या था वैध दादा का पोता जुट गया अपनी सोच को धारातल पर उतारने। उन्होंने कंडाली की पत्तियों से चाय तैयार करनी शुरू कर दी। इस दौरान उनकी 22 साल की सेवा में बने लिंक काम आए। इसी की बदौलत उन्होंने कोठारी पर्वतीय विकास समिति गठित की। साथ ही समिति में ग्रामीणों को जोड़ने का कार्य शुरू हुआ और कंडाली की पत्तियों से बनी चाय को मुंबई-दिल्ली के बड़े होटलों में भेजना शुरू कर दिया। जिससे आज वह लाखों में कमा रहे हैं। उत्तराखंड को अलग पहचान दिला रहे हैं। सैकड़ो लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी बने है
आपको बता दें कि सुनील क्षेत्र में अब तक 2200 ग्रामीणों को कंडाली की पत्तियों से चाय तैयार करने का प्रशिक्षण दे चुके हैं। प्रशिक्षण का यह क्रम क्षेत्र में आज भी जारी है। वर्तमान समय में ढाई सौ महिलाएं सीधे समूह से जुड़ी हैं। यह महिलाएं पत्तियों के सौ-सौ ग्राम के पैकेट तैयार करती हैं, जिन्हें समूह 200 से 250 रुपये प्रति सौ ग्राम से हिसाब से खरीदता है। इसके बाद इन पैकेट्स को हॉस्पीटेलिटी पर्चेस मैनेजर्स फोरम (आईपीएमएफ) के सुपुर्द कर दिया जाता है। आईपीएमएफ आठ से नौ सौ रूपये प्रति पैकेट से हिसाब से इसकी बिक्री करता है। जिससे उत्तराखंड की कंडाली एक अलग ही रूप में पहचान बना रही है। गौरतलब है कि कंडाली औषधीय गुणों से भरपूर है। इस घास का प्रयोग पित्त दोष, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और मलेरिया के इलाज में तो होता ही है, इसके बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि बिच्छू घास में काफी आयरन होता है।
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